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सहकारी
समितियॉ उ0प्र0,
|
कार्यालय जिला
सहायक निबन्धक, सहकारी समितियॉ उ0प्र0,
जनपद– मुजफ्फरनगर |
सहकारी आन्दोलन:
प्रशानिक ढॉचा:– |
1. जनपद स्तर पर:
जिला सहायक निबन्धक सहकारी समितियॉ उ0प्र0
2. कायालय पता: विकास भवन, तृतीय तल, मुजफ्फरनगर
: दूरभाष नं0–
3. तहसील स्तर पर: अपर जिला सहकारी अधिकारी
4. विकास खण्ड स्तर पर: सहायक विकास अधिकारी ‘‘सह0‘ |
सहकारी ऋण प्रक्रिया एवं ऋण के
प्रकार
1. अल्पकालीन ऋण:–
किसानों को अपनी ख्ेाती की तैयारी के
लिए धन की आवश्यकता पड़ती है ताकि कृषि यन्त्र, कृषि रक्षा
रसायन, उर्वरक, उन्नतिशील बीज आदि आदि क्रय कर सके। समितियों
द्वारा सुविधा अपने सदस्यों को ही उपलब्ध करायी जाती है।
एक फसल के लिए ऋण दिया जाता है जिसे फसली ऋण भी कहा जाता
है। यह ऋण अंश ‘‘क’’ एवं अंश ‘‘ख’’ के रूप में दिया जाता
है। जो ऋण नगद रूप में दिया जाता है उसे अंश ‘‘क’’ तथा जो
वस्तु के रूप में दिया जाता है उसे अंश ‘‘ख’’ कहते हैं।
किसान/व्यक्ति जब समिति का सदस्य बन जाता है तो उसकी भूमि
के अनुसार ऋण सीमा स्वीकृत कर दी जाती है और अंश ‘‘क’’ तथा
अंश ‘‘ख’’ की अलग–अलग चैक बुक उपलब्ध करा दी जाती है।
सदस्य अपनी आवश्यकतानुसार स्वीकृत ऋण सीमा के अन्तर्गत
समिति से ऋण प्राप्त करते वर्तमान में रबी/खरीफ फसलों के
लिए 14200 रू0 प्रति एकड़ वित्तमान निर्धारित किया गया है
जिसका 75 प्रतिशत अंश ‘‘क’’ तथा शेष 25 प्रतिशत अंश ‘‘ख’’
के रूप सदस्य प्राप्त कर सकता है तथा सम्पूर्ण ऋण सीमा का
उपयोग अंश ‘‘ख’’ के रूप में कर सकता है। इसके अतिरिक्त
स्वीकृत ऋण सीमा का 10 प्रतिशत उपभोग ऋण के रूप में भी
प्राप्त कर सकता है। बढ़ती हुई कीमतों तथा तकनीकी जानकारी
के अनुसार यह वित्तमान समय–समय पर बदलते रहते हैं। वर्तमान
में ब्याज दर 10 प्रतिशत है परन्तु समय से ऋण चुकाने वाले
नियमित सदस्यों को 4 प्रतिशत एवं अनियमित सदस्यों को 3
प्रतिशत का ब्याज अनुदान शासन द्वारा दिया जा रहा है। जब
फसल पक कर तैयार हो जाती है तो किसान से यह अपेक्षा की जाती
है कि वह अपनी फसल की बिक्री करके मय ब्याज के समय से ऋण
वापस कर दें।
2. मध्यकालीन/दीर्घकालीन ऋण:–
यह ऋण किसानों को 5 से 10 वर्ष की अवधि लिये दिया जाता है।
उ0प्र0 सहकारी ग्राम विकास बैंक लि0, लखनऊ की जनपद में सात
शाखाएं हैं जो किसानों को भैंस पालन, डनलपकार्ट,
टै्रक्टर्स, कृषि यन्त्रीकरण/मशीनरी, फूलों की खेती, आदि
प्रयोजनों के लिए ऋण उपलब्ध कराता है। सदस्यों को उनकी भूमि
के आधार पर उनकी आवश्यकतानुसार ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
ऋण की वापसी किश्तों में की जाती है, ये किश्तें किसान को
दिये गये ऋण के विनियोग से मिलने वाले प्रतिफल को देखते
हुए निर्धारित की जाती है।
3. विविधीकरण योजनान्तर्गत ऋण:– जिला सहकारी बैंक अपनी
शाखाओं के माध्यम से विभिन्न प्रयोजनों यथा ट्रैक्टर क्रय,
व्यवसासियक ऋण, आटा–चक्की लगाने, उपभोग ऋण आदि का ऋण वितरण
कराकर स्वरोजगार हेतु वित्तपोषण कर रही हैं।
ऋण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया:– जब कोई व्यक्ति सहकारी
समिति या संस्था का सदस्य बन जाता है तो उसे अल्पकालीन,
मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराया जाता है। ऋण
उपलब्ध कराने की प्रक्रिया निम्न है।
सर्वप्रथम सहकारी समिति की सदस्यता ग्रहण किया जाना आवश्यक
होता है इसके लिए व्यक्ति को न्यूनतम एक अंश का मूल्य जैसा
कि पैक्स में 100 रू0 निर्धारित है को सम्बंधित समिति में
जमा करना है साथ ही प्रवेश शुल्क 1/रू0 जमा करना होता है ।
सदस्यता ग्रहण कर लेने के बाद अपनी भूमि का इंतखाब, 3 फोटो
समिति कार्यालय में जमा करने होते हैं। इन फोटो में से एक
फोटो सदस्य के पासबुक पर लगाया जाता है। दो फोटो एलबम में
लगाए जाते हैं जिसमें से एक एलबम समिति कार्यालय तथा दूसरा
एलबम जिला सहकारी बैंक की शाखा पर रखा जाता है। सदस्य की
भूमि के क्षेत्रफल के हिसाब से उसकी हैसियत निकाली जाती है
जिसे बैंक की भाषा में ़ऋण सीमा कहते हैं। यह खरीफ तथा रबी
दोनों फसलों के लिए अलग–अलग निकाली जाती है जो समय–समय पर
मूल्य स्तर तथा कृषि निवेशों के मूल्य को ध्यान में रखते
हुए निबन्धक द्वारा जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित कमेटी
के द्वारा निर्धारित की जाती है। सदस्य अपनी स्वीकृत ऋण
सीमा के अन्तर्गत आवश्यकतानुसार ऋण सम्बन्धी समिति /जिला
सहकारी बैंक की शाखा से प्राप्त कर सकता है।
ब्याज का निर्धारण:–
पहले सहकारी वर्ष जुलाई से जून तक चलता था लेकिन अब यह अवधि
समाप्त कर वित्तीय वर्ष की भांति अपै्रल से मार्च कर दी गयी
है नियमानुसार प्रचलित दरों के अनुसार रबी/खरीफ में वितरित
ऋण पर ब्याज का निर्धाकरण वर्ष में दो बार किया जाता जो ऋण
रबी में मार्च माह तक बटता है उसकी मॉंग 1 अपै्रल को लगायी
जाती है तथा खरीफ में सितम्बर तक बटने वाले ऋण की मांग 01
अक्टूबर में लगाई जाती है।
ऋण वसूली
समिति का सफल संचालन उस समिति की वसूली पर निर्भर करता है।
यदि समिति की वसूली अच्छी होती है तो समिति की आर्थिक
स्थिति सुदृढ़ होगी और यदि वसूली कम होगी तो बकाया बढ़ जाने
के कारण समिति बैंक की बकायादार हो जाती है और बैंक से ऋण
वितरण की सुविधा नहीं मिल पाती है। अत: यह आवश्यक है कि
समिति जो ऋण वितरण करे उसे समय से सदस्यों से वसूल कर बैंक
को वापस कर दें ताकि बैंक से मिलने वाली सुविधायें समिति
को मिलती रहें और समिति को पैनल ब्याज न देना पडे़। ऋण
वसूली के लिए नियमों अधिनियमों में जो प्रक्रिया निर्धारित
की गयी है उसका विवरण निम्न है:–
चालू मॉंग की वसूली:– जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि
सहकारी मॉंग एक अक्टूबर और एक अपै्रल को लगायी जाती है। इस
मॉंग की वसूली के लिए सदस्यों से सम्पर्क, तकाजा किया जाना
चाहिए और यह नोटिस भी दी जानी चाहिये कि वे अपना ऋण अदा करें।
कभी–कभी ऐसी स्थिति भी देखने को मिलती है कि सदस्य अपनी
परिसम्पत्ति बेंच रहा होता है जिससे समिति में ऋण की वसूली
संदिग्ध हो जाती है ऐसी स्थिति में यदि सचिव सतर्कता से
कार्य करें तो सहकारी अधिनियम 1965 की धारा 94 में
कार्यवाही करा सकता है।
बकाया वसूली:–
जब ऋण की मॉग की वसूली 30 जून तक नहीं होती तो ऋण बकाया पड़
जाता है बकाया ऋण की वसूली हेतु बकायेदार सदस्यों को 95
‘‘क’’ वसूली प्रमाण पत्र निर्गत कराने से पूर्व एक पक्ष का
पंजीकृत नोटिस संस्था द्वारा भेजा जाता है, सहकारी अधिनियम
में प्राविधान किये गये है। सहकारी अधिनियम की धारा–
70,71,91,92,94 एवं 95 निर्दिष्ट है तथा तत्सम्बन्धी नियम
225 से 252 तक प्राविधानित है। यदि कोई सदस्य समिति द्वारा
दर्शाये गये ऋण को स्वीकार नहीं करता है और ऋण विवादास्पद
हो जाता है तो ऐसी स्थिति में समिति ऐसे सदस्य से नैतिक
आधार पर वसूली नहीं कर सकती है ऐसे मामले में समिति सदस्य
या दोनों को अधिकारपूर्वक इस विवाद के निपटारे के लिए
सक्षम अधिकारी के समक्ष मध्यस्थ निर्णय करने का प्राविधान
है, निपटारा निबन्धक, अधिनियम की धारा–71 में करेंगे और
मध्यस्थ द्वारा किये गये निर्णय का निष्पादन अधिनियम की
धारा 92 के अन्तर्गत किया जायेगा। यदि उसके द्वारा ऋण की
अदायगी नहीं की जाती है तो उसके विरूद्ध वसूली प्रमाण पत्र
सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्गत कराया जाता है तथा वसूली
हेतु उत्पीड़क कार्यवाही भी अमल में लायी जाती है।
मध्यस्थ निर्णय:– यदि किसी सदस्य द्वारा अपने ऋण की
विवादित होना बताया है तो ऐसी स्थिति में इस विवाद का
निपटारा सहकारी अधिनियम की धारा–70 में निबन्धक को निपटारे
हेतु प्रस्तुत किया जायेगा और धारा 71 में निबन्धक इस
विवाद का निपटारा करायेगा।
कृषि निवेश
कृषि निवेशों की आपूर्ति:–
ऋण व्यवसाय के अतिरिक्त दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यवसाय
जो समिति द्वारा किया जाता है, वह कृषि निवेशों अर्थात
उर्वरक, प्रमाणित बीज तथा कृषि रक्षा दवाइयों की आपूर्ति
करना है।
मूल्य समर्थन योजना:– मूल्य समर्थन योजनान्तर्गत गेहूं/धान/की
खरीद का कार्य पी0सी0एफ0 द्वारा जिलाधिकारी की अध्यक्षता
में चयनित कराये गये सहकारी समिति के क्रय केन्द्रों के
माध्यम से कराया जाता है। जनपद में वर्ष 2009–10 में 29
गेहूॅ क्रय केन्द एवं 4 धान क्रय केन्द्र संचालित कराये गये।
इस प्रकार कृषकों को उनकी उपज का उचित मूल्य का लाभ
सहकारिता के माध्यम से प्रदान किया जा रहा है।
जिला सहकारी विकास संघ लि0, मुजफ्फरनगर:– जनपद की
केन्द्रीय सहकारी संस्था डी0सी0डी0एफ0 निम्न रूप में
व्यवसाय करके प्रदेश में स्थान स्थापित करने में सफल है–
1. डीसीडीएफ द्वारा संचालित कोफेट गैस ‘‘इण्डेन’’ गैस
एजेन्सी है जो शहर के उपभोक्ताओं को एलपीजी गैस की आपूर्ति
कर रही हैं।
2. डीसीडीएफ के पास 2000 मै0टन क्षमता का सहकारी शीतगृह है
जो हॉनि में होने के कारण संस्था की सामान्य निकाय द्वारा
लिये गये निर्णय क्रम में बन्द कर दिया गया है और इस स्थान
पर कैटिल फीड प्लाण्ट लगाये जाने का निर्णय लिया है। जिसमें
कृषकों/के उत्पाद गुड़, आलू को भण्डारित किया जाता है।
3. डीसीडीएफ के द्वारा सहकारी छपाईखाना जिला परिषद मार्केट
में है।
4. उपभोक्ताओं को उचित दर पर उपभोक्ता वस्तुएं सुलभ कराने
के उद्देश्य से गोल मार्केट में उचित दर की दुकान संचालित
है।
5. जनपद की तहसील बुढ़ाना, सदर के अन्तर्गत सहकारी संस्थाओं
को उर्वरक आपूर्ति परिवहन एजेन्सी के रूप में कर रही है।
6. जनपद की सहकारी संस्थाओं को उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति
का कार्य कर रही हैं। कृषकों को पशु आहार उचित दर पर
उपलब्ध कराने का व्यवसाय कर रही है।
7. डीसीडीएफ द्वारा फुटकर उर्वरक बिक्री केन्द्र द्वारा
संचालित किये जा रहे हैं।
इस संस्था के पास अपना निजी ट्रक है जिसका उपयोग इण्डेन
गैस को लाने में किया जा रहा है, संस्था निरन्तर लाभ पर
अग्रसर है तथा मार्च 09 तक संकलित लाभ 45.00 लाख है।
क्रय–विक्रय सहकारी समितियॉं:– जनपद में निम्न क्रय–विक्रय
समितियॉं हैं:–
1. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 मुजफ्फरनगर
2. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 खतौली
3. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 शामली
4. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 मीरापुर
उक्त क्रय–विक्रय समितियों में मीरापुर वर्ष 2008–09 तक
निष्क्रिय थी जिसे 2009–10 में सक्रिय कर दिया गया है और
उसके द्वारा उर्वरक बिक्री केन्द्र संचालित किया जा रहा है
मुजफ्फरनगर एवं खतौली द्वारा उर्वरक/उपभेक्ता व्यवसाय किया
जा रहा है तथा शामली द्वारा इण्डेन गैस एजेन्सी के रूप में
एलपीजी गैस वितरण का कार्य किया जा रहा है।
सहकारी पूर्ति भण्डार/सहकारी संघ:– जनपद में 26 पंजीकृत
हैं जिनमें से 19 सक्रिय है इनके द्वारा सवाई खाद्यान्न
गेहूॅ को भण्डारित किया जाता है और कृषकों को खाद्यन्न की
पूर्ति का कार्य प्रत्येक वर्ष किया जाता है। और गेहूॅ की
फसल आने पर कृषकों से सवाई खाद्यान्न के रूप में वसूली की
जाती है जो कृषक खाद्यान्न के रूप में जमा नहीं कर पाते
हैं उन्हें नकद में जमा करने का विकल्प रहता है। जनपद की
शाहपुर, मोरना, भोपा, तिस्स, मंसूरपुर, पुरामुबारिकपुर,
थानाभवन व अन्य सहकारी संघों द्वारा उर्वरक बिक्री का भी
कार्य किया जा रहा है।
वेतनभोगी सहकारी समितियॉ:– जनपद के विभिन्न
विद्यालयों/सरकारी कार्यालयों/उपक्रम में कार्यरत
कर्मचारियेां के द्वारा अपनी तात्कालीक आवश्यकताओं की
पूर्ति हेतु वेतनभोगी कर्मचारी सहकारी ऋण समितियों का गठन
किया गया है, गठित समितियॉ अपने सदस्यों को उनके वेतन
प्रमाण पत्र के आधार पर जिला सहकारी बैंक लि0, मु0नगर से
ऋण सीमा स्वीकत कराकर वित्तपोषित करती हैं। स्वीकृत ऋण
सीमा के आधार पर अधिकतम् 2.00 लाख रू0 तक का ऋण सदस्य
प्राप्त कर सकता है जिसकी अदायगी उसके वेतनबिल से
नियोक्ता/कार्यालयध्यक्ष द्वारा 36 मासिक किश्तों में
कटौती कर कराई जाती है।
सहकारी समितियों का गठन/निबन्धन :– उ0प्र0 सहकारी समिति
अधिनियम 1965 की धारा 7 के अन्तर्गत सहकारी समितियों का
निबन्धन, निबन्धक द्वारा किया जाता है तथा निबन्धन प्रमाण
पत्र धारा–8 के अन्तर्गत निर्गत किया जाता है। समितियॉ जो
निबन्धित की जा सकती हैं उनकी व्याख्या धारा– 4 में है,
धारा–6 में निबन्धन के लिए प्रार्थना पत्र के विषय में
उल्लेख है तथा निबन्धन से सम्बंधित धाराओं के साथ पठित
नियम सं0– 3 से 12 व 13 से 23 में सुसंगत प्राविधान किये
गये हैं।
<प्रो0 बैद्यनाथन कमेटी की संस्तुतियां एवं कृषि ऋण माफी और राहत योजना 2008’’
भारत सरकार के वार्षिक बजट 2008–09 में माननीय वित्त
मंत्री जी के द्वारा अपने बजट भाषण में किसानों के लिये ऋण
माफी एवं राहत योजना की घोषणा की गयी है, जिसमें मुख्यत:
भारत सरकार के द्वारा फसली ऋण, अल्पकालीन एवं मध्यकालीन
समयान्तर्गत किसानों के बकाया ऋण की माफी एवं एकबारगी
निपटान योजना के द्वारा उनकी वसूली के बारे में स्पष्ट
दिशा–निर्देश दिये गये हैं, जो निम्नवत् हैं:–
1. पात्रता:– ऋण माफी एवं ऋण राहत हेतु निम्न प्रकार की
पात्रतायें निर्धारित की गयी हैं:–
(क)सीमान्त एवं लघु कृषकों के मामले में सम्पूर्ण ऋण राशि
की माफी की जायेगी।
(ख) अन्य किसानों के मामले में एकबारगी निपटान योजना
(ओ.टी.एस.) होगी, इनमें ऋण राशि की 25 प्रतिशत की छूट इस
शर्त के साथ दी जायेगी कि शेष 75 प्रतिशत का भुगतान कृषक
द्वारा कर दिया जायेगा।
(1)सीमान्त कृषक से तात्पर्य है–एक हेक्टेयर (2.5 एकड़) की
भूमि पर मालिक के रूप में अथवा भाड़े या बटाई पर खेती करने
वाला कृषक।
(2)लघु कृषक से तात्पर्य है–एक हेक्टेयर से अधिक व दो
हेक्टेयर तक (2.5 एकड़ से अधिक व 5 एकड़ तक) की भूमि पर
मालिक के रूप में अथवा भाड़े या बटाई पर खेती करने वाले
कृषक।
(3)अन्य कृषक से तात्पर्य है– दो हेक्टेयर से अधिक (5 एकड़
से अधिक) की भूमि पर मालिक के रूप में अथवा भाड़े या बटाई
पर खेती करने वाला कृषक।
उपरोक्त के अतिरिक्त संयुक्त रूप से खेती करने वाले कृषकों
(joint farming) एक से
अधिक कृषकों द्वारा समूह के रूप में मिलकर जोत करने वालों
की पात्रता के लिये 50,000.00 रूपये से अधिक नहीं है, लघु
एवं सीमान्त कृषक की श्रेणी में आयेंगे, रू0 50,000.00 से
अधिक वाले अन्य कृषक की श्रेणी में आयेंगे।
किसान क्रेडिट कार्ड के द्वारा लिया गया ऋण भी इस योजना
में सम्मिलित किया जायेगा।
(घ) अल्पावधि उत्पादन ऋण के मामले में ऐसे ऋण की राशि
(लागू ब्याज सहित) जो–
01.04.1997 से 31 मार्च 2007 तक संवितरित की गयी हो और 31
दिसम्बर 2007 को अतिदेय
(overdue)
एवं 29 फरवरी 2008 तक
जिसका भुगतान न हुआ हो, उपरोक्त के अतिरिक्त कृषक से
सम्बन्धित अन्य क्रिया–कलापों हेतु लिया गया ऋण अल्पकालीन
एवं मध्यकालीन ऋण की गणना भी उपरोक्तानुसार की जायेगी।
वर्ष 2004 एवं 2006 में भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष
पैकेज के माध्यम से पुन: अनुसूचीकृत किया गया हो, चाहे वह
अतिदेय हो या नहीं।
प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारतीय रिजर्व बैंक के प्रयोज्य
मार्ग निर्देशों के अनुसार 31 मार्च 2007 तक सामान्य तौर
पर पुन: संरचित और पुन: अनुसूचीकृत किया गया हो, चाहे वह
अतिदेय हो या नहीं।
(च) निवेश के मामले में ऐसे ऋणों की किस्तें, जो अतिदेय
(किस्तों पर प्रयोज्य ब्याज सहित) जो अतिदेय हों, यदि ऋण
01.04.1997 से 31 मार्च 2007 तक संवितरित की गयी हो और 31
दिसम्बर 2007 को अतिदेय
(overdue) ्ध एवं 29 फरवरी 2008 तक
जिसका भुगतान न हुआ हो, उपरोक्त के अतिरिक्त कृषि से
सम्बन्धित अन्य क्रिया–कलापों हेतु लिया गया ऋण अल्पकालीन
एवं मध्यकालीन ऋण की गणना भी उपरोक्तानुसार की जायेगी।
वर्ष 2004 एवं 2006 में भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष
पैकेज के माध्यम से पुन: संरचित एवं पुन: अनुसूचीकृत किया
गया हो, चाहे वह अतिदेय हो या नहीं।
प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारतीय रिजर्व बैंक के प्रयोज्य
मार्ग निर्देशों के अनुसार 31 मार्च 2007 तक सामान्य तौर
पर पुन: संरचित और पुन: अनुसूचीकृत किया गया हो, चाहे वह
अतिदेय हो या नहीं।
स्पष्टीकरण:01.04.1997 से 31 मार्च 2007 तक संवितरित और
अनर्जक आस्ति के रूप में वर्गीकृत निवेश ऋण के मामले में
जिसमें वाद दायर किया गया हो, केवल उन्हीं किश्तों की राशि
पात्र होगी, जो 31 दिसम्बर 2007 को अतिदेय होंगी।
नोट–निम्नलिखित ऋण योजनान्तर्गत शामिल नहीं किये जायेंगे:–
(क) खड़ी फसल से इतर कृषि उत्पाद को बन्धक या दृष्टिबन्धक
रखकर लिये गये अग्रिम।
(ख) सहकारी ऋण संस्थाओं और समान प्रकार की अन्य संस्था से
भिन्न किसी कम्पनी, साझेदारी फर्म, समितियों को प्रदत्त
ऋणस।
(ग) इस योजना में निहित कोई बात किसी संस्था द्वारा 31
मार्च 1997 से पहले संवितरित ऋण पर लागू नहीं होगी।
प्रो0 वैद्यनाथन् की संस्तुति रिवाईवज पैकेज:–
केन्द्र सरकार के अन्तर्गत स्तर पर हुए विचार–विमर्श के
उपरान्त वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा दिनांक 05
जनवरी 2006 को रिवाईवज पैकेज जारी किया गया। प्रदेश में
रिवाईवल पैकेज को लागू करने के लिए दिनांक 18 दिसम्बर,
2006 को राज्य सरकार, भारत सरकार एवं नाबार्ड के मध्य
सहमति ज्ञापन पत्र हस्ताक्षरित किया गया। रिवाईवज पैकेज के
अन्तर्गत जनपद की 93 पैक्स का विशेष लेखा परीक्षा कराया
गया, इसके उपरान्त जिलाधिकारी महोदय की अध्यक्षता में गठित
जिला स्तरीय क्रियान्वयन समिति के अनुमोदनों उपरान्त जनपद
की 23 पैक्स का मु0 20253378–00 की वित्तीय सहायता का
प्रस्ताव राज्य स्तरीय समिति को पे्रषित कराया गया जिसमें
से 21 पैक्स को मु0 13952334/– की धनराशि जिला सहकारी बैंक
के माध्यम से पैक्स को प्राप्त हो चुकी है, उक्त धनराशि
में से मु0 13355489/– भारत सरकार का अंश मु0 596845/–
राज्य सरकार का अंश है।
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सहकारिता (Co-operative) |
परिचय:–
सहकारिता न केवल मानव जीवन बल्कि पशु पक्षियों एवं वनस्पति
जगत में भी देखने को मिलती है। मनुष्य को कदम–कदम पर सहयोग
की आवश्यकता पडती है। जिस काम को एक व्यक्ति अकेला नहीं कर
सकता है उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए दूसरे का सहयोग
ही सहकारिता है। शादी विवाह के आयोजन में भी आस–पड़ोस का
सहयोग लिया जाता है। गॉव में छप्पर उठाना सहकार का एक अच्छा
उदाहरण है। वनस्पति जगत में क्रिया देखने को मिलती है जिसमें
एक जन्तु दूसरे जनतु का सहारा बनता है। यदि पशु पक्षियों
में देखा जाये तो वहॉ भी सहकारिता के लक्षण दृष्टिगोचर होते
हैं। जैसे जंगली जानवर मिलकर शिकार करते हैं। चीटियॉ मिल
कर भोजन व्यवस्था करती है। मधुमक्यिॉ मिलकर शहद बनाती है।
सहकारिता मानव के अधिकतम् से अधिकतम कल्याण के स्वावलम्बन
और पारस्परिक सिद्धान्तों के आदर्शो पर आधारित एक व्यवस्था
है जिसमें सदस्यगण स्वेच्छा पूर्वक समान उद्देश्य की पूर्ति
हेतु समता की भावना से सम्मिलित होते हैं, यह न तो
पूॅजीवाद की भॉति अचेतनपूर्ण संचालित है न साम्यवाद की भॉति
राज्य नियंत्रित है।
सहकारिताका कार्य:–
सहकारिता के कोई भी कार्य एक ही उद्देश्य वाले व्यक्तियों
द्वार ाएक संगठन बनाकर किये जाते हैं। सम्पूर्ण कार्य का
उत्तरदायित्व सभी सदस्यों को समान रूप से होता है। अपनी
आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी सदस्यों को
भलाई के कार्य होते है। यद्यपि समिति को पूॅजी की आवश्यकता
पड़ती है फिर भी सदस्य द्वारा दी गयी पॅूजी की अपेक्षा
व्यक्ति को अधिक महत्व दिया जाता है। इस प्रकार सहकारिता
में व्यक्ति का स्थान मुख्य तथा पूॅजी का गौण है।
सहकारिता के सिद्धान्त:–
सहकारिता के सात सिद्धान्त है जो निम्नवत है:–
1. खुली एवं स्वैच्छिक सदस्यता:– सहकारी समितियों
की सदस्यता खुली एवं स्वैच्छिक होनी चाहिए। संचालक मण्डल
कोई कृत्रिम प्रतिबन्ध न लगाये, किसी प्रकार का सामाजिक,
आर्थिक, राजनैतिक धार्मिक भेद–भावन न रखा जाए। किसी भी
धर्म जाति के स्त्री पुरूष समान रूप से सहकारी समिति के
सदस्य स्वेच्छा से बन सकते हैं और स्वेच्छा से सदस्यता से
अलग हो सकते हैं।
2. सदस्यों को पूर्ण स्वतंत्रता होगी कि वे
निष्पक्ष रूप से संचालक मण्डल, अध्यक्ष उपाध्यक्ष का चुनाव
करें, जिसक ेलिए वे उत्तरदायी है। प्रत्येक सदस्य को
संचालक मण्डल के चयन में अपना मत देने का अधिकार हो।
निष्पक्ष रूप से सुयोग्य पदाधिकारियेंा का चुनाव करेगें
प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा।
3. पूॅजी पर सीमित ब्याज:– सहकारी संस्थाओं का
उद्देश्य लाभ कमाना नहीं वरन् सदस्यों को आर्थिक हित
संवर्धन करना है। अत: यदि अंश पूॅजी पर ब्याज दिया भी जाता
है तो उसकी दर यथार्थवादी होनी चाहिए।
4. आर्थिक लाभ (बचत):– किसी भी समिति का आर्थिक लाभ
‘‘बचत‘‘ उसके सदस्याें की सम्पत्ति है इसलिए इसका वितरण इस
प्रकार होना चाहिए कि एक सदस्य को लाभ एवं दूसरे को हॉनि न
पहुॅच सकें। यह वितरण कार्य सदस्यों के निर्णय के अनुसार
निम्न प्रकार से किये जायेगें:
अ– समिति के कारोबार के विकास के लिए प्राविधान करके।
ब– सामान्य सेवाओं का प्राविधान कर अथवा।
स– सदस्यों के उनके द्वारा समिति से किये लेने–देन
के अनुपात में वितरण करके।
5. सहकारी शिक्षा:– सभी सहकारी समितियों को अपने
सदस्यों, पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों व आम जनता के लिए
आर्थिक एवं लोकतांत्रिक दोनों पहलुओं से सहकारिता के
सिद्धान्तों एवं तकनीकी की शिक्षा का प्राविधान करना चाहिए।
6. सहकारी संस्थाओं में पारस्परिक सहयोगी:– सभी
सहकारी संगठनों को अपने सदस्यों एवं समुदाओं के हितों की
सर्वोत्तम पूर्ति के लिए स्थानीय राष्ट्रीय एवं
अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर स्थित अन्य सहकारी संस्थाओं के
साथ व्यवहारिक तरीके से सक्रिय सहयोग स्थापित करना चाहिए।
7. सामाजिक कर्तव्य बोध:– यह सिद्धान्त हाल ही में
प्रतिदान किया गया है। सम्पूर्ण समाज के विकास का बोध होना,
समिति स्तर पर आवश्यक है। अत: समिति के प्रत्येक सदस्य को
अपने व्यक्तिगत उन्नति के साथ–साथ सामाजिक उन्नति के प्रति
सजग रहे।
सहकारी समिति के सदस्य तथा
समान्य प्रबन्ध व्यवस्था:– प्रारम्भिक कृषि ऋण
सहकारी समितियों का प्रबन्ध, एक लोकतांत्रिक ईकाई के रूप
में, उसके सदस्य प्रबन्ध कमेटी/संचालक मण्डल के सदस्यें तथा
वैतनिक कर्मचारियेां में निहित होता है। राज्य सरकार,
सहकारिता विभाग, वित्त पोषक बैंक एवं अन्य सम्बंधित
संस्थाओं द्वारा भी समय–समय पर मार्गदर्शन, पर्यवेक्षण,
निरीक्षण सम्प्रेक्षण आदि के माध्यम से समिति के प्रबन्ध
में सहायता प्रदान की जाती है। समिति के सभी सदस्यों के
लिए यह सम्भव नहीं है कि वे समिति के दिन प्रतिदिन के
कार्यो की देखभाल स्वयं कर सकें। अत: वे इस उद्देश्य के
लिए अपने में से कुछ सदस्यों को निर्वाचित करते है, इन
निर्वाचित प्रतिनिधियों से समिति की प्रबन्ध कमेटी संचालक
मण्डल का गठन होता है, जिसकी माह में कम से कम एक बार अथवा
जैसा समिति की उपविधियों में प्राविधान हो, उतनी बार बैठक
की जाती है। प्रबन्ध कमेटी /संचालक मण्डल बैठक में
प्रबन्धकीय एवं व्यवसायिक निर्णय लिए जाते है, समिति के
वैतनिक कर्मचारी प्रबन्ध कमेटी/ संचालक मण्डल के प्रति
उत्तरदायी होते हैं। कर्मचारियेां का नेतृत्व समिति के
मुख्य कार्यपालक के रूप में समिति का सचिव/प्रबन्ध निदेशक
करता है। प्रबन्ध कमेटी/संचालक मण्डल का नेतृत्व समिति का
सभापति करता है। समिति के समस्त सदस्य वर्ष में एक बार
प्रबन्ध कमेटी द्वारा किये गये कार्यो एवं समिति द्वारा
चलाये गये व्यवसाओं तथा प्रदान की गयी सेवाओं के प्रभाव की
समीक्षा और विचार–विमर्श करने के लिए अपनी बैठक करते हैं,
जिसे वार्षिक सामान्य निकाय की बैठक कहते हैं।
सहकारी समिति के सदस्य:– समिति के साधारण सदस्य ही समिति
के वास्तविक स्वामी होते हैं। अत: व्यक्ति विशेष को समिति
सदस्यता प्रदान करते समय कुछ विशेष बातों पर ध्यान दिया
जाना चाहिए। सहकारिता के सिद्धान्त के अनुसार समिति की
सदस्यता स्वैच्छिक एवं खुली होती है। कोई भी व्यक्ति जो
समिति की सेवाओं का उपयोग करना चाहता हों, जिसमें
निर्दिष्ठ अर्हताएं हों और जो सदस्य का दायित्व वहन करने
के लिए तैयार हो वह बिना किसी बनावटी प्रतिबन्ध या किसी
सामाजिक, राजनैतिक, जातीय अथवा धार्मिक भेदभाव के समिति का
सदस्य बन सकता है।
1.सदस्यों की अर्हताएं ‘‘धारा–17‘‘:–
1. व्यस्य अर्थात 18 वर्ष की आयु का होना चाहिए।
2. स्वस्थ चित्त का हो।
3. किसी विधि द्वारा संविदा करने से मना न किया गया
हो।
4. समिति के कार्यक्षेत्र में निवास अथवा स्थाई
करोबार करता हो।
5. जो व्यक्ति पहले से किसी प्रारम्भिक ऋण सहकारी
समिति का सदस्य हो, वह दूसरी ऋण सहकारी समिति का (उ0प्र0
सहकारी ग्राम्य विकास बैंक को छोड़कर) बिना निबन्धक की
पूर्व अनुमति के सदस्य नहीं हो सकता है। नियम –42
6. सदस्यता से निकाला हुआ सदस्य दो वर्ष तक पुन: उसी
समिति में सदस्य नहीं बन सकता है। नियम–44
7. उसे ऐसा व्यक्ति नहीं होना चाहिए जिसका व्यापार/धंधा
समिति के उद्देश्यों के प्रतिकूल हो।
सदस्यों के अधिकार:– सहकारी समिति के सदस्यों के
निम्नलिखित अधिकार है:–
– स्वामित्व का अधिकार: – प्रत्येक सदस्य समिति में
अंशपूॅजी जमा करके सहस्वामित्व का अधिकार प्राप्त करता है
और वह समिति के लाभ एवं हॉनि में भागीदार होता है।
– निर्णय में भाग लेने का अधिकार:– समिति के
प्रबन्ध में निर्णय लेने का अधिकार सदस्यों को है, वे समिति
की सामान्य बैठक में भाग लेते हैं और विचार–विमर्श के अवसर
पर अपना विचार व्यक्त करते हैं तथा निर्णय लेने में हिस्सा
लेते हैंं।
– प्रबन्ध समिति की सदस्यता हेतु चुनाव लड़ने का
अधिकार।
– अभिलेखेंा को देखने तथा उनकी प्रतिलिपि प्राप्त करने का
अधिकार नियम–64
– सदस्यता से पृथक होने का अधिकार।
– प्रत्येक सदस्य को समिति के कार्यकाल के समय में स्वयं
तथा समिति के बीच हुए लेनदेन जॉच का अधिकार।
– सदस्यों के अंश या हित को बाहरी करने के लिए कुर्क न होने
का अधिकार धारा–42
– अंश को वापिस लेने या हस्तारित करने का अधिकार।
– मत देने का अधिकार।
– मध्यस्थ निर्णय हेतु निबन्धक को विवाद अभिदिष्ठ करने का
अधिकार धारा–70
– लाभॉश पाने का अधिकार।
– असााधारण सामान्य बैठक बुलाने का अधिकारी धारा–22 (2)
– कार्यालय समय में अधिनियम, नियम समिति की उपविधि, संतुलन
पत्र लाभ हॉनि खाता की निर्धारित शुल्क जमा कर प्राप्त कर
परीक्षण करने का अधिकार।
सदस्यता की
समाप्ति:– धारा–26 के
अनुसार समिति का कोई सदस्य यदि वह समिति का ऋणी न हो या
किसी अदत्त ऋण का प्रतिभूत ‘‘स्योरिटी‘‘ न हो, समिति को कम
से कम एक माह की नोटिस देने के बाद समिति की सदस्यता छोड़
सकता है, किन्तु उपविधियों में निर्धारित न्यूनतम अवधि अथवा
एक वर्ष तक सदस्य रहना आवश्यक है। सदस्यता छोड़ देने की
नोटिस की अवधि व्यतीत हो जाने के पश्चात यह समझाा जायेगा
कि उसने सदस्यता छोड़ दी है।
सदस्यता
से हटाया या निकाला जाना:–
धारा–27 व नियम 56 से 62 क उपबन्धाें के अनुसार समिति या
निबन्धक द्वारा सदस्य की नियम प्रक्रिया तथा कारणाें पर
हटाया जा सकता है। किन्तु निकालने का समिति का संकल्प या
निबन्धक का आदेश सदस्य को सुनवाई का अवसर दिए बिना नहीं
किया जा सकता है।
किसी सदस्य को सदस्यता से हटाया जा सकता है यदि:–
1. वह निर्धारित अर्हताओं की पूर्ति न करता हो।
2. वह अधिनियम नियमों या उपनियमों के उपबन्धों का
उल्लंधन करके सदस्य बनाया गया हो।
3. वह विकृत चित्त का हो जाए।
4. उसकी सदस्यता नियम–8 ‘‘ख‘‘ के उपबन्धों में
असंगत हो अर्थात वह समिति द्वारा प्रदत्त सेवाओं जैसे उधार,
उपभोग वस्तु, कच्चे माल का उत्पादक आदि का उपयोग न करता
हो।
सदस्य के कर्तव्य:–
सदस्यों के कर्तव्यों की जानकारी निम्न है:–
1. सदस्य जिस उद्देश्य के लिए ऋण ले रहा है उसी
उद्देश्य के लिए प्रयोग करें, ऐसा करने से जहॉ उस सदस्य के
उद्देश्य की पूर्ति होगी वहीं उसके ऋण का सदुपयोग हो जाने
से उसकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी ऐसा ही करने का वह अन्य
सदस्यों से भी कहें, उदा0– के लिए यदि किसी किसान ने अंश–क
ऋण इसलिए लिया था कि वह अपनी खेती हेतु बैल खरीदेगा लेकिन
उसने उस धन का प्रयोग बैल खरीदने के लिए न करके यदि शादी/मृत्यु
भोज, जुए जैसे अन्य अउत्पादक कार्यो पर खर्च कर दिया तो
उसकी आय नहीं बढ़ेगी परिणाम स्वरूप वह कर्ज वापिस नहीं कर
पाएगा।
2. समिति से लिए गए ऋण को समय से अदा करें, तथा
अन्य सदस्यों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें, यदि
सदस्य समय से समिति का ऋण वापस कर देता है उसे बहुत लाभ
होगें, जिनका वर्णन ऊपर किया जा चुका है।
3. सहकारी शिक्षा में बताई गयी बातों पर अमल करें
बचत तथा मितव्ययिता के आधार पर अपना उत्पादन चलाएं और बचत
करने की आदत डालकर पूॅजी निर्माण करें।
4. सहकारी समिति से नियमित कारोबार करके ऋण का लेन
देन करें।
5. सदस्य समिति के कारोबार में अपना सक्रिय योगदान
करके समिति को प्रगति पथ पर लें जाएं। ऐसा कोई कार्य न करें
जिससे समिति की छवि धूमिल होती हो ऐसा करने से अन्य सदस्यों
को भी रोकें।
6. सदस्य समिति की बैठकों में मामले तथा समिति के
हित में अपने सुझााव प्रस्तुत करें।
7. समिति के निर्वाचन में भाग लेकर योग्य व्यक्तियों
का प्रबन्ध कमेटी में चुनकर भेजना तथा अन्य सहकारी संस्थाओं
के लिए योग्य प्रतिनिधि चुनकर भेजना।
8. यदि समिति परिसमापन में चली गयी हो तो समिति की
उपविधियों के अनुसार देय धन की निर्धारित सीमा तक चुकाएगा।
|
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प्रबन्ध
कमेटी |
प्रबन्ध कमेटी सदस्यों की ओर से समिति का
संचालन करती है वह सदस्यों के प्रति उत्तदायी रहते हुए
समिति के दैनिक कार्यो की देख–रेख करती है। वह निर्णय
लेती है और सुनिश्चित करती है कि निर्णयों को
कर्मचारियों द्वारा क्रियान्वित किया गया है। समिति की
सफलता उसके प्रबन्ध कमेटी की सही एवं उपयोगी निर्णय
लेने की योग्यता पर आधारित होती है। अत: प्रबन्ध कमेटी
के सदस्यों को सुयोग्य, कुशल, वफादार, एवं दूरदर्शी
होना चाहिए।
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गठन:– प्रबन्ध कमेटी के
सदस्यों की संख्या–15 से अधिक नहीं होगी (नियम 393)
इसमें कम से कम तीन निर्बल वर्ग का भी प्रतिनिधि होगा,
जिनमें एक अनुसूचित जाति/जनजाति, एक अन्य पिछड़ा वर्ग
एक महिला होगी। इसी सीमा के भीतर प्रत्येक समिति अपनी
प्रबन्ध कमेटी की कुल संख्या उपविधियों में निर्धारित
करती है। प्रबन्ध कमेटी के सदस्य साधारण सदस्य सदस्यों
में से चुनाव द्वारा, निबन्धक द्वारा मनोनयन, राज्य
सरकार द्वारा मनोनयन एवं अमेलन द्वारा बनाऐ जा सकते
हैं।
प्रबन्ध कमेटी के सदसयों की
अर्हताएं (नियम 453):–
1. आयु 21 वर्ष से कम न हो।
2. गूॅगा, बहरा, अन्धा एवं कोढ़ से पीडि़त न
हो।
3. दिवालिया घोषित न हो।
4. समिति का 6 माह से अधिक का बकायादार न हो।
5. वह राजकीय सेवा या किसी सहकारी समिति की सेवा
अथवा निगमित निकाय से कपट, दुराचरण या अनुचित कार्यो
के लिए पदच्युत न किया गया हो और पदच्युत का ऐसा आदेश
अपील में रदद न किया गया हो।
6. गबन एवं सम्पत्ति को हॉनि पहुॅचाने आदि के
आरोप में समिति से निकालने के पश्चात दो वर्ष बाद पुन:
प्रवेश दिया गया हो और पुन: प्रवेश के पश्चात 3 वर्ष
पूरे न हुए हो।
7. निबन्धक की आज्ञा के बिना वह या उसके परिवार
का कोई सदस्य उस समिति के कार्य क्षेत्र में कोई ऐसा
व्यपार न कर रहा हो जैसा समिति कर रही हो।
8. वह समिति के साथ अधिनियम या उपविधियों का
उल्लंधन करके कोई सौदा या अनुबन्ध न कर लिया हों।
9. वह समिति या उससे सम्बंधित किसी अन्य समिति
के अन्तर्गत लाभ के पद पर न हो।
10. वह 3 अन्य सहकारी समितियॅा की प्रबन्ध कमेटी
का पहले से ही सदस्य न हो।
11. वह उस समिति की प्रबन्ध कमेटी का लगातार
पूरे या आंशिक दो कार्यकाल तक सदस्य न रहा हो।
12. यदि वह प्रबन्ध कमेटी का चुनाव लड़ा था
परन्तु हार गया हो तब उसे मनोनीत या आमेलित नहंी किया
जा सकता है।
13. प्रबन्ध कमेटी की तीन लगातार बैठकों में
बिना उचित कारण के अनुपस्थित होने पर (परन्तु उसकी
गिनती में कोरम के अभाव में स्थगित बैठक नहीं होगी)
प्रबन्ध कमेटी का सदस्य बने रहने का हकदार न होगा।
14. वह समिति के सामन्य निकाय का सदस्य न रहे।
प्रबन्ध कमेटी के अधिकार एवं
कर्तव्य:–
1. सहकारी समिति की प्रगति विकास हेतु बजट/योजना
बनाना।
2. सामान्य निकाय के निर्णयों को क्रियान्वित
करना।
3. समिति के व्यवसाय वृद्धि एवं लाभ के लिए हर
सम्भव कार्यवाही करना।
4. समिति के विरूद्ध दावों की पैरवी करना।
5. अंशधन के हस्तांरण की अनुमति देना (धारा–23)
6. यदि किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए तथा उसके
द्वारा उत्तराधिकारी का मनोनयन न किया गया हो तो उसके
वारिस का पता लगाना (धारा–24)
7. समिति के कार्य सम्पादन हेतु जब–जब आवश्यकता
हो, समिति की साधारण एवं असाधारण बैठकें बुलाना (धारा–
33)
8. यदि सदस्य में अर्हता न रह गयी हो और वह किसी
भी प्रकार से अयोग्य हो गया हो तो प्रबन्ध कमेटी
संकल्प द्वारा ऐसे सदस्य का सदस्यता से हटा सकता है (नियम
454)
9. यदि कोई सदस्य नियमों, नियमों एवं समिति की
उपविधियों का उल्लंधन करके या समिति को जानबूझकर हॉनि
पहुॅचाया हो या समिति की निधि एवं सम्पत्ति का
दुरूपयोग किया हो तो कमेटी ऐसे सदस्यों को निकाल सकती
है। (नियम 57–59)
10. समिति के समापन की दशामें समस्त दायित्वों
को भुगतान करने के बाद (नियम 117) शेष धनराशि को
कल्याणी योजनाओं में लगाना नियम–172
11. लेखा परीक्षक की रिपोर्ट पर विचार करना तथा
उसका संक्षिप्त विवरण तैयार कर वार्षिक सामान्य निकाय
की बैठक हेतु अनुमोदित करना (नियम–93)
12. प्रबन्ध कमेटी अपने किसी संकल्प को पास किए
जाने के बाद निबन्धक की पूर्व स्वीकृति बिना 6 माह तक
परिवर्तित, विखंण्डित या संशोधित नहीं कर सकती (नियम–394)
13. सहकारी समिति के बैंक खातों का संचालन करने
का उत्तरदायित्व सौंपना।
14. राज्य सरकार से अंशपूॅजी प्राप्त करने हेतु
प्रस्ताव करना।
15. समिति की बकाया राशि की वसूली हेतु आवश्यक
कार्यवाही करना, मध्यस्थ निर्णय हेतु वाद प्रस्तुत करना
व डिक्री का निष्पादन करना।
16. प्रबन्ध समिति के सदस्याें के त्याग पत्र
को स्वीकृत करना।
17. 6 माह के लिए स्थानापन्न सचिव को नियुक्त
करना।
18. सदस्यों को ऋण प्रदान करने की स्वीकृति देना।
19. समिति के व्यवसाय/कार्य के संचालन के लिए
आवश्यक पूॅजी की व्यवस्था करना।
20. मासिक प्रगति प्रतिवेदनों/लेखा की समीक्षा
एवं जॉच करना एवं उसका अनुमोदन करना।
21. सामान्य निकाय की बैठक में प्रस्तुत करने
हेतु समिति के वार्षिक लेखा/ प्रतिवेदनों की जॉच करना।
|
प्रबन्ध
कमेटी के दायित्व:– प्रबन्ध कमेटी के
प्रत्येक सदस्य पर निम्नलिखित दायित्व होगें (नियम
115)
1. समिति के कार्य कलापों के संचालन में साधारण
व्यवसाय की तरह बुद्धिमानी और मेहनत से कार्य करना।
2. समिति के साथ किसी संविदा में बेची या खरीदी
गई सम्पत्ति में तथा लेन देन में कोई हित न रखना (नियम
116)
3. कोई सरकारी सेवक यदि प्रबन्ध कमेटी में नाम
निर्दिष्ट या पदेन हो तो पदाधिकारी या प्रतिनिधि के
निर्वाचन में मतदान नहीं करेगा (नियम 117) |
|
|
प्रबन्ध
समिति की बैठक का आयोजन:–
– प्रबन्ध समिति की प्रत्येक बैठक समिति के मुख्यालय
पर होगी (नियम 95)
– बैठक बुलाने का उत्तरदायित्व सचिव/प्रबन्ध निदेशक का
होगा।
– प्रबन्ध कमेटी के कोई भी 3 सदस्य बैठक बुलाने की मॉग
कर सकते है (114)
– प्रबन्ध कमेटी के सदस्यों की बैठक की सूचना 7 दिन
पूर्व (जिसमें दिनांक समय स्थान एवं विषय जिन पर विचार
होना हो) कार्य सूची के साथ प्रत्येक सदस्य के पास भेजी
जायेगी।
– गणपूर्ति निश्चित समय से आधे घण्टे के भीतर न हो तो
बैठक स्थगित की जा सकती है, यदि बैठक सदस्यों की मॉगपर
बुलाई गयी हो तो निश्चित समय से 1 घण्टे के भीतर यदि
वांछित गणपूर्ति न हो तो बैठक की स्थगित किया जा सकता
है।
– बैठक में दी गयी कार्यसूची पर क्रम में विचार किया
जायेगा जब तक कि बैठक की अध्यक्षता करने वाला व्यक्ति
उपस्थित सदस्यों के बहुमत से क्रम में परिवर्तन करने
के लिए सहमत न हो। (नियम 103)
– संकल्प पर मतभेद होने पर सदस्यों द्वारा मतदान की
मॉग की जा सकती है। (नियम 106)
बैठक की अध्यक्षता कौन करेगा:–
1. समिति के सभापति या उनकी अनुपस्थिति में उपसभापति
अथवा दोनों की अनुपस्थिति में बैठक में उपस्थित सदस्यों
द्वारा चुना गया कोई सदस्य बैठक की अध्यक्षता करेगा। (नियम
98)
2. बैठक की अध्यक्षता करने वाला व्यक्ति किसी कार्यवाही
का संचालन संतोषजनक ढंग से करेगा तथा व्यवस्थ के सभी
प्रश्नों का निर्णय बैठक में करेगा (नियम 99) |
|
सहकारी समितियों के निर्वाचन से सम्बंधित प्राविधान एवं
निर्देश |
उ0प्र0 सहकारी समिति अधिनियम 1965
के अन्तर्गत गठित सहकारी समितियों में प्रबन्ध का
अधिकार उक्त अधिनियम की धारा 29 के अन्तर्गत प्रबन्ध
कमेटी में निहित किया गया है। प्रबन्ध कमेटी का गठन
सामान्य निकाय के सदस्यों द्वारा अधिनियम, नियमावली एवं
उपविधियों के अन्तर्गत किया जाता है। सहकारी समितियों
के निर्वाचन के लिए उ0प्र0 सहकारी समिति नियमावली 1968
के नियम 402 से 465 में विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया
है।
निर्वाचन प्रक्रिया:–
1. सहकारी समितियों की प्रबन्ध कमेटियों में
समिति की उपविधि के अनुसार 7 से लेकर 15 तक संचालक
समिति की सामान्य निकाय के सदस्यों द्वारा गोपनीय
मतदान के माध्यम से निर्वाचित किये जाते हैं जो समिति
के कार्यो को विधिक एवं सुचारूप रूप से संचालित करने
हेतु अपनों में से एक अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का
निर्वाचन करते हैं।
2. सहकारी समितियों में निर्वाचन की तिथियॉ
निबन्धक, सहकारी समितियॉ उ0प्र0, लखनऊ के द्वारा शासन
के अनुसार निर्धारित की जाती है।
3. तिथियों के निर्धारण के पश्चात निर्धारित
निर्वाचन शुल्क जमा करते हुए निर्वाचन कराने का
प्रस्ताव सहकारी समिति का सचिव प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी
समिति की स्थिति में जिला सहायक निबन्धक के यहॉ एवं
केन्द्रीयत व शीर्ष सहकारी समिति की स्थिति में
क्षेत्रीय संयुक्त निबन्धक के यहॉ प्रस्तुत करता है और
साथ ही निर्वाचन क्षेत्रों के अवधारण एवं उनके आरक्षण
कराने का भी अनुरोध करता है।
4. समितियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर
प्रारम्भिक सहकारी समितियों में जिला सहायक निबन्धक एवं
केन्द्रीय तथा शीर्ष सहकारी संस्थाओं में क्षेत्रीय
संयुक्त निबन्धक के द्वारा समितियों के क्षेत्रों का
अवधारणा एवं आरक्षण उ0प्र0 सहकारी समिति अधिनियम 1965
एवं नियमावली 1968 की सुसंंगत धाराओं एवं नियमों के
अन्तर्गत किया जाता है। निर्वाचन क्षेत्रों का अवधारणा
निबन्धक द्वारा निर्वाचन तिथियॉ घोषित करने के बाद एवं
निर्वाचन कार्यक्रम प्रकाशित होने के पूर्व किया जाता
है।
5. जिला सहायक निबन्धक द्वारा जिला मजिस्ट्रेट
से निर्वाचन होने वाली समितियों में उ0प्र0 सहकारी
समिति नियमावली 1968 के अन्तर्गत विभिन्न विभागों के (सहकारिता
विभाग के प्रशासनिक अधिकारियेां को छोड़कर) अधिकारियों
में से निर्वाचन अधिकारी नियुक्त कराये जाते हैं जिनके
द्वारा सहकारी समिति नियमावली के नियम 402 से लेकर 465
तक में दिये गये निर्देशानुसार सहकारी समितियों में
निर्वाचन प्रक्रिया निम्नानुसार सम्पन्न करायी जाती
है:–
निर्वाचन अधिकारी द्वारा 30 दिन से अनाधिक एवं कम से
कम 15 दिन पूर्व निर्वाचन की नोटिस प्रकाशित कराई
जायेगी जिसमें निर्वाचन कार्यक्रम का विवरण निमनुसार
होगा:–
1. अनन्तिम मतदाता सूची के प्रदर्शन का दिनांक
2. आपत्तियॉ दाखिल करने और उनके निस्तारण का
दिनांक समय एवं स्थान
3. अनन्तिम मतदाता सूची के प्रदर्शन का दिनांक
4. नाम निर्देशन दाखिल करने का दिनांक, समय व
स्थान
5. नाम निर्देशन पत्रों के परिनिरीक्षण का
दिनांक, समय एवं स्थान
6. नाम निर्देशन वापस लेने का दिनांक समय एवं
स्थान
7. निर्वाचन चिन्ह आवंटित करने और अन्तिम नाम
निर्देशन प्रदर्शित करने का दिनांक समय और स्थान
8. मतदान का दिनांक समय और स्थान
|
उपयुर्क्तानुसार निर्वाचन कार्यक्रम
प्रकाशित होते ही समिति का सचिव अपने समस्त सदस्यों की
अनन्तिम मतदाता सूची को निर्वाचन अधिकारी के माध्यम से
समिति के मुख्यालय पर प्रदर्शित करता है जिसमें समिति
के वे बकायेदार भी सम्मिलित किये जाते हैं जो अपनी
बकाया की धनराशि को मतदाता सूची के अन्तिम होने की तिथि
तक अदा कर सकते हैं।
उपरोक्त निर्वाचन प्रक्रिया के अनुसार निर्वाचन अधिकारी
सर्वप्रथम संचालकों के निर्वाचन की प्रक्रिया पूरी करते
हैं एवं उसके अगले तिथि में उपरोक्त प्रक्रिया के
अनुसार निर्वाचित/नामित संचालकों में से समिति के
अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं समिति द्वारा विभिन्न संस्थाओं
में भेजे जाने वाले प्रतिनिधियाें को निर्वाचित करते
हैं।
निर्वाचन अधिकारी द्वारा उपरोक्त निर्वाचन प्रक्रिया
पूर्ण करने के पश्चात समस्त निर्वाचन परिणामों की सूचना
की एक प्रति जिला सहायक निबन्धक, कार्यालय को प्रेषित
की जाती है और निर्वाचन से सम्बंधित सभी समिति के
अभिलेख सील करके समिति के कार्यालय में सुरक्षित रखी
जाती है।
|
भेजे जानेवाले प्रतिनिधियों की
संख्या एवं उनकी अर्हताएं:– जिन सहकारी समितियों
की सदस्य अन्य समितियॉं होती हैं वहॉं सदस्य समितियों
द्वारा अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए उन समितियों में
प्रतिनिधि भेजे जाते हैं। यही उक्त समिति के सामान्य
निकाय में अपनी समिति का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा
मतदान में भाग लेते हैं।
निम्नलिखित समितियॉं निम्नलिखित रूप से प्रतिनिधि
रख सकती है:–
1. (क) जिला/ केन्द्रीय सहकारी बैंक अपने
सामान्य निकाय में प्रत्येक सदस्य से निम्नलिखित रूप
में प्रतिनिधि रख सकती है:–
1. प्रारम्भिक कृषि ऋण समितिछ:
2. ब्लाक यूनियनचार
3. क्रय–विक्रय समितिचार
4. जिला सहकारी फेडरेशनदो
5. जिला/थोक उपभोक्ता स्टोरदो
6. कोई अन्य समितिदो
प्रतिबन्ध यह है कि उपयुर्क्त (1) से (6) तक में
प्रत्येक में कम से कम एक प्रतिनिधि अनुसूचित जाति या
अनुसूचित जनजाति का होगा।
जिला सहकारी फेडरेशन अपने सामान्य निकाय में
निम्नलिखित रूप से प्रतिनिधि रख सकता है:–
1. क्रय–विक्रय समितिचार
2. ब्लाक यूनियन समितिचार
3. प्रक्रिया समितिचार
4. कोई अन्य समितिदो
प्रतिबन्ध यह है कि प्रत्येक का कम से कम एक प्रतिनिधि
अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों का होगा:
जिला/थोक उपभोक्ता स्टोर अपने सामान्य निकाय में
प्रत्येक सदस्य समिति से 3 प्रतिनिधि रख सकता है,
परन्तु प्रारम्भिक उपभोक्ता भण्डार की स्थिति में
प्रतिनिधियों में कम से कम एक महिला होगी।
क्रय–विक्रय या प्रक्रिया समितियॉ अपने सामान्य निकाय
में प्रत्येक सदस्य समिति से निम्नलिखित रूप में
प्रतिनिधि रख सकती है:–
1. प्रारम्भिक ऋण समितिछ:
2. कोई अन्य समितिदो
प्रबन्ध यह है कि एक प्रतिनिधि अनुसूचित जातियों या
अनुसूचित जनजातियों का होगा।
ब्लाक यूनियन अपने सामान्य निकाय में प्रत्येक सदस्य
समिति के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आनेवाली ग्राम सभाओं
की संख्या के बराबर प्रतिनिधि रख सकती है।
प्रतिनिधियों की अनर्हतायें:
प्रतिनिधियों की अनर्हताओं का विवरण नियम 86 एवं 87
में है जो निम्नवत है:–
नियम– 84: कोई भी सहकारी समिति, समिति के प्रतिनिधि के
रूप में किसी दूसरी सहकारी समिति में प्रतिनिधित्व करने
के लिए किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं करेगी,, यदि उस
व्यक्ति के नियम 453 के किसी भी उपनियम (क),(ख),(ग),(घ),(ड),(च),(छ),(ज),(झ),(अ),(ट),(ठ),(ढ),
और (ण) में निर्धारित कोई भी अनर्हता हो।
नियम–87: कोई व्यक्ति जो किसी सहकारी समिति का
पहले से ही प्रतिनिधि हो, ऐसा प्रतिनिधि नहीं रह जाएगा,
यदि
1. वह नियम–86 में निर्दिष्ट कोई अनर्हता
अर्जित कर लें या
2. वह उस समिति का जिसका वह प्रतिनिधि हो,
सदस्य न रह जाए या
3. वह समिति जिसका वह प्रतिनिधि हो, उस समिति
का जिसमें उसका प्रतिनिधित्व हो, सदस्य न रह जाए या
4. वह उस समिति का सदस्य न रह जाए जो ऐसी समिति
का सदस्य था जिसने उसे किसी दूसरी सहकारी समिति में
अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना हों या
5. वह उस पद पर न रह जाए जिसके कारण वह समिति
की उपविधियों के शर्ताें के अनुसार समिति का प्रतिनिधि
था या
6. वह समिति, जिसका वह प्रतिनिधि था, धारा–72
के अनतर्गत समर्पित कर दी जाए या
7. वह धारा–35 के अधीन निबन्धक द्वारा नियुक्त
कमेटी, प्रशासक या प्रशासकों द्वारा वापस बुला लिया
जाए या
8. वह समिति जिसका वह प्रतिनिधित्व करता हो,
किसी अन्य सहकारी समिति या समितियों के साथ सम्मिलित
कर दी जाए या
9. वह समिति जिसका वह प्रतिनिधित्व करता हो, एक
या अधिक समितियों में विभाजित कर दी जाए या
10. वह ऐसे प्रतिनिधि के पद से त्याग पत्र दे
दे।
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अन्य
प्रतिनिधियों में भेजे जाने वाले प्रतिनिधियों का
चुनाव प्रतिनिधियों का कार्यकाल:–
नियम 89 में दी गयी व्यवस्थानुसार कोई्र प्रतिनिधि अपनी
समिति का प्रतिनिधितव तब तक करता रहेगा जब तक कि उसके
स्थान पर दूसरा प्रतिनिधि न नियुक्त कर दिया जाए।
सहकारी ऋण प्रक्रिया एवं ऋण के प्रकार
1. अल्पकालीन ऋण:–
किसानों को अपनी ख्ेाती की तैयारी के लिए धन की
आवश्यकता पड़ती है ताकि कृषि यन्त्र, कृषि रक्षा रसायन,
उर्वरक, उन्नतिशील बीज आदि आदि क्रय कर सके। समितियों
द्वारा सुविधा अपने सदस्यों को ही उपलब्ध करायी जाती
है। एक फसल के लिए ऋण दिया जाता है जिसे फसली ऋण भी कहा
जाता है। यह ऋण अंश ‘‘क’’ एवं अंश ‘‘ख’’ के रूप में
दिया जाता है। जो ऋण नगद रूप में दिया जाता है उसे अंश
‘‘क’’ तथा जो वस्तु के रूप में दिया जाता है उसे अंश
‘‘ख’’ कहते हैं। किसान/व्यक्ति जब समिति का सदस्य बन
जाता है तो उसकी भूमि के अनुसार ऋण सीमा स्वीकृत कर दी
जाती है और अंश ‘‘क’’ तथा अंश ‘‘ख’’ की अलग–अलग चैक
बुक उपलब्ध करा दी जाती है। सदस्य अपनी आवश्यकतानुसार
स्वीकृत ऋण सीमा के अन्तर्गत समिति से ऋण प्राप्त करते
वर्तमान में रबी/खरीफ फसलों के लिए 11400 रू0 प्रति
एकड़ वित्तमान निर्धारित किया गया है जिसका 75 प्रतिशत
अंश ‘‘क’’ तथा शेष 25 प्रतिशत अंश ‘‘ख’’ के रूप में
सदस्य प्राप्त कर सकता है तथा सम्पूर्ण ऋण सीमा का
उपयोग अंश ‘‘ख’’ के रूप ममें कर सकता है। इसके
अतिरिक्त स्वीकृत ऋण सीमा का 10 प्रतिशत उपभोग ऋण के
रूप में भी प्राप्त कर सकता है। बढ़ती हुई कीमतों तथा
तकनीकी जानकारी के अनुसार यह वित्तमान समय–समय पर बदलते
रहते हैं। वर्तमान में ब्याज दर 10 प्रतिशत है परन्तु
समय से ऋण चुकाने वाले नियमित सदस्यों को 4 प्रतिशत एवं
अनियमित सदस्यों को 3 प्रतिशत का ब्याज अनुदान शासन
द्वारा दिया जा रहा है। जब फसल पक कर तैयार हो जाती है
तो किसान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी फसल की
बिक्री करके मय ब्याज के समय ऋण वापस कर दें।
2. मध्यकालीन/दीर्घकालीन ऋण:–
यदि ऋण किसानों को 5 से 10 वर्ष के लिये दिया जाता है।
उ0प्र0 सहकारी ग्राम्य विकास बैंक लि0, की शाखाओं
द्वारा जनपद में सात शाखाएं हैं यह किसानों को भैंस
पालन, डनलपकार्ट, टै्रक्टर्स, कृषि यन्त्रीकरण/मशीनरी,
फूलों की खेती, आदि प्रयोजनों के लिए ऋण उपलब्ध कराता
है। सदस्यों को उनकी भूमि के आधार पर उनकी
आवश्यकतानुसार ऋण उपलब्ध कराया जाता है। ऋण की वापसी
किश्तों में की जाती है, ये किश्तें किसान को दिये गये
ऋण के विनियोग से मिलने वाले प्रतिफल को देखते हुए
निर्धारित की जाती है।
ऋण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया:– जब कोई सहकारी समिति
या संस्था का सदस्य बन जाता है जो उसे अल्पकालीन,
मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराया जाता है। ऋण
उपलब्ध कराने की प्रक्रिया निम्न है।
सर्वप्रथम सदस्य की सदस्यता ग्रहण कर लेने के बाद अपनी
भूमि का इंतखाब, 3 फोटो समिति कार्यालय में जमा करने
होते हैं। इन फोटो में से एक फोटो सदस्य के पासबुक पर
लगाया जाता है। दो फोटो एलबम में लगाए जाते हैं जिसमें
से एक एलबम समिति कार्यालय तथा दूसरा एलबम जिला सहकारी
बैंक की शाखा पर रखा जाता है। सदस्य भूमि के हिसाब से
उसकी हैसियत निकाली जाती है जिसे बैंक की भाषा में ़ऋण
सीमा कहते हैं। यह खरीफ तथा रबी दोनों फसलों के लिए
अलग–अलग निकाली जाती है जो समय–समय पर मूल्य स्तर तथा
कृषि निवेशों के मूल्य को ध्यान में रखते हुए निबन्धक
द्वारा निर्धारित की जाती है। वर्तमान में 11400/रू0
प्रति एकड़ निर्धारित है जो रबी/खरीफ फसलों के लिए है
इस वित्तमान का 75 प्रतिशत अंश ‘‘क’’ तथा 25 प्रतिशत
‘‘ख’’ के रूप में सदस्य प्राप्त कर सकता है, इसके
अतिरिक्त कुल स्वीकृत ऋण सीमा का 10 प्रतिशत उपभोग ऋण
के रूप में प्राप्त कर सकता है।
ब्याज का निर्धारण:–
पहले सहकारी वर्ष जुलाई से जून तक चलता था लेकिन अब यह
अवधि समाप्त कर वित्तीय वर्ष की भांति अपै्रल से मार्च
कर दी गयी है नियमानुसार प्रचलित दरों के अनुसार रबी/खरीफ
में वितरित ऋण पर ब्याज का निर्धाकरण वर्ष में दो बार
किया जाता जो ऋण रबी में मार्च माह तक बटता है उसकी
मॉंग 1 अपै्रल को लगायी जाती है तथा खरीफ में सितम्बर
तक बटने वाले ऋण की मांग 01 अक्टूबर में लगाई जाती है।
ऋण वसूली:-
समिति का सफल संचालन उस समिति की वसूली पर निर्भर करता
है। यदि समिति की वसूली अच्छी होती है तो समिति की
आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी और यदि वसूली कम होगी तो
बकाया बढ़ जाने के कारण समिति बैंक की बकायादार हो जाती
है और बैंक ऋण वितरण की सुविधा नहीं मिल पाती है। अत:
यह आवश्यक है कि समिति जो ऋण वितरण करे उसे समय से
सदस्यों से वसूल कर बैंक को वापस कर दें ताकि बैंक से
मिलने वाली सुविधायें समिति को मिलती रहें और समिति को
पैनल ब्याज न देना पडे़। ऋण वसूली के लिए नियमों
अधिनियमों में जो प्रक्रिया निर्धारित की गयी है उसका
विवरण निम्न है:–
चालू मॉंग की वसूली:–
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि सहकारी मॉंग एक
अक्टूबर और एक अपै्रल को लगायी जाती है। इस मॉंग की
वसूली के लिए सदस्यों से सम्पर्क, तकाजा किया जाना
चाहिए और यह नोटिस भी दी जानी चाहिये कि वे अपना ऋण अदा
करें। कभी–कभी ऐसी स्थिति भी देखने को मिलती है कि
सदस्य अपनी परिसम्पत्ति बेंच रहा होता है जिससे समिति
में ऋण की वसूली संदिग्ध हो जाती है ऐसी स्थिति में यदि
सचिव सतर्कता से कार्य करें तो सहकारी अधिनियम 1965 की
धारा 94 में कार्यवाही करा सकता है।
बकाया वसूली:–
जब ऋण की मॉग की वसूली 31/30 जून तक नहीं होती तो ऋण
बकाया पड़ जाता है बकाया ऋण की वसूली हेतु बकायेदार
सदस्यों को 95 ‘‘क’’ वसूली प्रमाण पत्र निर्गत कराने
से पूर्व एक पक्ष का पंजीकृत नोटिस संस्था द्वारा भेजा
जाता है, सहकारी अधिनियम में प्राविधान किये गये है।
सहकारी अधिनियम की धारा– 70,71,91,92,94 एवं 95
निर्दिष्ट है तथा तत्सम्बन्धी नियम 225 संस्था से 252
तक प्राविधानित है। यदि कोई सदस्य समिति द्वारा दर्शाये
गये ऋण को स्वीकार नहीं करता है और ऋण विवादास्पद हो
जाता है तो ऐसी स्थिति में समिति ऐसे सदस्य से नैतिक
आधार पर वसूली नहीं कर सकती है ऐसे मामले में समिति
सदस्य या दोनों को अधिकारपूर्वक इस विवाद के निपटारे
के लिए सक्षम अधिकारी के समक्ष मध्यनिर्णय का दावा
दायर करने प्राविधान है, निपटारा निबन्धक, अधिनियम की
धारा–71 में करेंगे और मध्यस्थ द्वारा किये गये निर्णय
का निष्पादन अधिनियम की धारा 92 के अन्तर्गत किया
जायेगा। यदि उसके द्वारा ऋण की अदायगी नहीं की जाती है
तो उसके विरूद्ध वसूली प्रमाण पत्र सक्षम प्राधिकारी
द्वारा निर्गत कराया जाता है तथा वसूली हेतु उत्पीड़क
कार्यवाही भी अमल में लायी जाती है।
मध्यस्थ निर्णय:–
यदि किसी सदस्य द्वारा अपने ऋण की विवादित होना बताया
है तो ऐसी स्थिति में इस विवाद का निपटारा सहकारी
अधिनियम की धारा–70 में निबन्धक को निपटारे हेतु
प्रस्तुत किया जायेगा और धारा 71 में निबन्धक इस विवाद
का निपटारा करायेगा।
प्रो0 बैद्यनाथन कमेटी
की संस्तुतियां एवं
‘‘कृषि ऋण माफी और राहत योजना 2008’’
भारत सरकार के वार्षिक बजट 2008–09 में माननीय वित्त
मंत्री जी के द्वारा अपने बजट भाषण में किसानों के लिये
ऋण माफी एवं राहत योजना की घोषणा की गयी है, जिसमें
मुख्यत: भारत सरकार के द्वारा फसली ऋण, अल्पकालीन एवं
मध्यकालीन समयान्तर्गत किसानों के बकाया ऋण की माफी एवं
एकबारगी निपटान योजना के द्वारा उनकी वसूली के बारे
में स्पष्ट दिशा–निर्देश दिये गये हैं, जो निम्नवत्
हैं:–
1. पात्रता:– ऋण माफी एवं ऋण राहत हेतु निम्न
प्रकार की पात्रतायें निर्धारित की गयी हैं:–
(क)सीमान्त एवं लघु कृषकों के मामले में
सम्पूर्ण ऋण राशि की माफी की जायेगी।
(ख) अन्य किसानों के मामले में एकबारगी निपटान
योजना (ओ.टी.एस.) होगी, इनमें ऋण राशि की 25 प्रतिशत
की छूट इस शर्त के साथ दी जायेगी कि शेष 75 प्रतिशत का
भुगतान कृषक द्वारा कर दिया जायेगा।
(1)सीमान्त कृषक से तात्पर्य है–एक हेक्टेयर
(2.5 एकड़) की भूमि पर मालिक के रूप में अथवा भाड़े या
बटाई पर खेती करने वाला कृषक।
(2)लघु कृषक से तात्पर्य है–एक हेक्टेयर से
अधिक व दो हेक्टेयर तक (2.5 एकड़ से अधिक व 5 एकड़ तक)
की भूमि पर मालिक के रूप में अथवा भाड़े या बटाई पर
खेती करने वाले कृषक।
(3)अन्य कृषक से तात्पर्य है– दो हेक्टेयर से
अधिक (5 एकड़ से अधिक) की भूमि पर मालिक के रूप में
अथवा भाड़े या बटाई पर खेती करने वाला कृषक।
उपरोक्त के अतिरिक्त संयुक्त रूप से खेती करने वाले
कृषकों (joint farming)एक से
अधिक कृषकों द्वारा समूह के रूप में मिलकर जोत करने
वालों की पात्रता के लिये 50,000.00 रूपये से अधिक नहीं
है, लघु एवं सीमान्त कृषक की श्रेणी में आयेंगे, रू0
50,000.00 से अधिक वाले अन्य कृषक की श्रेणी में आयेंगे।
किसान क्रेडिट कार्ड के द्वारा लिया गया ऋण भी इस योजना
में सम्मिलित किया जायेगा।
(घ) अल्पावधि उत्पादन ऋण के मामले में ऐसे ऋण
की राशि (लागू ब्याज सहित) जो–
01.04.1997 से 31 मार्च 2007 तक संवितरित की गयी हो और
31 दिसम्बर 2007 को अतिदेय ;वअमतकनमद्ध एवं 29 फरवरी
2008 तक जिसका भुगतान न हुआ हो, उपरोक्त के अतिरिक्त
कृषक से सम्बन्धित अन्य क्रिया–कलापों हेतु लिया गया
ऋण अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण की गणना भी
उपरोक्तानुसार की जायेगी।
वर्ष 2004 एवं 2006 में भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष
पैकेज के माध्यम से पुन: अनुसूचीकृत किया गया हो, चाहे
वह अतिदेय हो या नहीं।
प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारतीय रिजर्व बैंक के
प्रयोज्य मार्ग निर्देशों के अनुसार 31 मार्च 2007 तक
सामान्य तौर पर पुन: संरचित और पुन: अनुसूचीकृत किया
गया हो, चाहे वह अतिदेय हो या नहीं।
(च) निवेश के मामले में ऐसे ऋणों की किस्तें,
जो अतिदेय (किस्तों पर प्रयोज्य ब्याज सहित) जो अतिदेय
हों, यदि ऋण
01.04.1997 से 31 मार्च 2007 तक संवितरित की गयी हो और
31 दिसम्बर 2007 को अतिदेय(overdue) एवं 29 फरवरी 2008
तक जिसका भुगतान न हुआ हो, उपरोक्त के अतिरिक्त कृषि
से सम्बन्धित अन्य क्रिया–कलापों हेतु लिया गया ऋण
अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण की गणना भी उपरोक्तानुसार
की जायेगी।
वर्ष 2004 एवं 2006 में भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष
पैकेज के माध्यम से पुन: संरचित एवं पुन: अनुसूचीकृत
किया गया हो, चाहे वह अतिदेय हो या नहीं।
प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारतीय रिजर्व बैंक के
प्रयोज्य मार्ग निर्देशों के अनुसार 31 मार्च 2007 तक
सामान्य तौर पर पुन: संरचित और पुन: अनुसूचीकृत किया
गया हो, चाहे वह अतिदेय हो या नहीं।
स्पष्टीकरण:01.04.1997 से 31 मार्च 2007 तक संवितरित
और अनर्जक आस्ति के रूप में वर्गीकृत निवेश ऋण के मामले
में जिसमें वाद दायर किया गया हो, केवल उन्हीं किश्तों
की राशि पात्र होगी, जो 31 दिसम्बर 2007 को अतिदेय
होंगी।
नोट–निम्नलिखित ऋण योजनान्तर्गत शामिल नहीं किये
जायेंगे:–
(क) खड़ी फसल से इतर कृषि उत्पाद को बन्धक या
दृष्टिबन्धक रखकर लिये गये अग्रिम।
(ख) सहकारी ऋण संस्थाओं और समान प्रकार की अन्य
संस्था से भिन्न किसी कम्पनी, साझेदारी फर्म, समितियों
को प्रदत्त ऋणस।
(ग) इस योजना में निहित कोई बात किसी संस्था
द्वारा 31 मार्च 1997 से पहले संवितरित ऋण पर लागू नहीं
होगी।
प्रो0 वैद्यनाथन् की संस्तुति रिवाईवज पैकेज:–
केन्द्र सरकार के अन्तर्गत स्तर पर हुए विचार–विमर्श
के उपरान्त वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा दिनांक
05 जनवरी 2006 को रिवाईवज पैकेज जारी किया गया। प्रदेश
में रिवाईवल पैकेज को लागू करने के लिए दिनांक 18
दिसम्बर, 2006 को राज्य सरकार, भारत सरकार एवं नाबार्ड
के मध्य सहमति ज्ञापन पत्र हस्ताक्षरित किया गया।
रिवाईवज पैकेज के अन्तर्गत जनपद की 93 पैक्स का विशेष
लेखा परीक्षा कराया गया, इसके उपरान्त जिलाधिकारी
महोदय की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय क्रियान्वयन
समिति के अनुमोदनों उपरान्त जनपद की 23 पैक्स का मु0
20253378–00 की वित्तीय सहायता का प्रस्ताव राज्य
स्तरीय समिति को पे्रषित कराया गया जिसमें से 21 पैक्स
को मु0 13952334/– की धनराशि जिला सहकारी बैंक के
माध्यम से पैक्स को प्राप्त हो चुकी है, उक्त धनराशि
में से मु0 13355489/– भारत सरकार का अंश मु0 596845/–
राज्य सरकार का अंश है।
कृषि निवेश
ब. कृषि निवेशों की आपूर्ति:–
ऋण व्यवसाय के पश्चात दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण
व्यवसाय जो समिति द्वारा किया जाता है, वह कृषि निवेशों
अर्थात उर्वरक, प्रमाणित बीज तथा कृषि रक्षा दवाइयों
की आपूर्ति करना है।
अध्याय – 8
मूल्य समर्थन योजना
स.मूल्य समर्थन योजनान्तर्गत गेहूं/धान/की खरीद का
कार्य पी0सी0एफ0 द्वारा जिलाधिकारी की अध्यक्षता में
चयनित कराये गये सहकारी समिति के क्रय केन्द्रों के
माध्यम से कराया जाता है। जनपद में वर्ष 2008–09 में
28 क्रय केन्द्र संचालित कराये गये। इस प्रकार कृषकों
को उनकी उपज का उचित मूल्य का लाभ सहकारित के माध्यम
से प्रदान किया जा रहा है।
कृषि उपज का उचित मूल्य किसानों को उपलब्ध कराने के
उद्देश्य से केन्द्र/राज्य सरकार द्वारा विभिन्न फसलों
के समर्थन मूल्य प्रत्येक वर्ष घोषित किये जाते हैं।
बाजार भाव समर्थन मूल्य से कम होने की स्थिति में
केन्द्र/राज्य सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर कृषि उपज
की खरीद की जाती है। इस खरीद हेतु राज्य सरकार द्वारा
पी0सी0एफ0 तथा उपभोक्ता संघ को मार्केटिंग विभाग,
एफ0सी0आई0 आदि अन्य संस्थाओं के साथ क्रय एजेन्सी
नामित किया जाता है। पी0सी0एफ0 एवं उपभोक्ता संघ द्वारा
समितियों को अपना खरीद एजेन्ट नियुक्त करते हुए समितियों
पर क्रय केन्द्र स्थापित किये जाते हैं।
मूल्य समर्थन योजनान्तर्गत मुख्य रूप से गेहूॅं खरीद
अपै्रल से 30 जून तक की जाती है।
जिला सहकारी विकास संघ लि0, मुजफ्फरनगर:– जनपद की
केन्द्रीय सहकारी संस्था डी0सी0डी0एफ0 निम्न रूप में
व्यवसाय करके प्रदेश में स्थान स्थापित करने में सफल
है–
1. डीसीडीएफ द्वारा संचालित कोफेट गैस ‘‘इण्डेन’’ गैस
एजेन्सी है जो शहर के उपभोक्ताओं को एलपीजी गैस की
आपूर्ति कर रही हैं।
2. डीसीडीएफ के पास 2000 मै0टन क्षमता का सहकारी
शीतगृत है जिसमें कृषकों/के उत्पाद गुड़, आलू को
भण्डारित किया जाता है।
3. डीसीडीएफ के द्वारा सहकारी छपाईखाना जिला परिषद
मार्केट में है।
4. उपभोक्ताओं को उचित दर पर उपभोक्ता वस्तुएं सुलभ
कराने के उद्देश्य से गोल मार्केट में उचित दर की
दुकान संचालित है।
5. जनपद की तहसील बुढ़ाना, सदर के अन्तर्गत सहकारी
संस्थाओं को उर्वरक आपूर्ति परिवहन एजेन्सी के रूप में
कर रही है।
6. जनपद की सहकारी संस्थाओं को उपभोक्ता वस्तुओं की
आपूर्ति का कार्य कर रही हैं। कृषकों को पशु आहार उचित
दर पर उपलब्ध कराने का व्यवसाय कर रही है।
7. डीसीडीएफ द्वारा फुटकर उर्वरक बिक्री केन्द्र द्वारा
संचालित किये जा रहे हैं।
इस संस्था के पास अपना निजी ट्रक है जिसका उपयोग
इण्डेन गैस को लाने में किया जा रहा है, संस्था
निरन्तर लाभ पर अग्रसर है तथा मार्च 08 तक संकलित लाभ...............................लाख
है।
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क्रय–विक्रय
सहकारी समितियॉं:– जनपद में निम्न क्रय–विक्रय
समितियॉं हैं:–
1. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 मुजफ्फरनगर
2. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 खतौली
3. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 शामली
4. सहकारी क्रय–विक्रय समिति लि0 मीरापुर
उक्त क्रय–विक्रय समितियों में मीरापुर निष्क्रिय है,
शेष सक्रिय है। मुजफ्फरनगर एवं खतौली द्वारा उर्वरक/उपभेक्ता
व्यवसाय किया जा रहा है तथा शामली द्वारा इण्डेन गैस
एजेन्सी के रूप में एलपीजी गैस वितरण का कार्य किया जा
रहा है।
नगरीय सहकारी बैंक:–
जनपद में निम्न नगरीय बैंक कार्यरत हैं:–
1. गंगा मर्केनटाइल अरबन को–आपरेटिव बैंक लि0,
मुजफ्फरनगर
2. गुलशन मर्केन्टाईल अरबन को–आपरेटिव बैंक लि0,
मुजफ्फरनगर
3. आदर्श महिला अरबन को–आपरेटिव बैंक लि0, मुजफ्फरनगर
उक्त बैंक शहरी एवं अद्र्धशहरी क्षेत्र के व्यक्तियों
से अमानतें लेकर इस धनराशि का विनियोज प्राथमिक
क्षेत्र वाले व्यक्तियों में ऋण वितरण के रूप में कर
रही है, इससे शहरी एवं अद्र्धशहरी क्षेत्र के लोगों को
विभिन्न प्रयोजनों के लिए ऋण सुलभ हो रहा है, तथा
विभिन्न व्यवसायिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल रहा
है। इस प्रकार नगरीय बैंक, नगरीय एवं अद्र्ध नगरीय
क्षेत्र में आर्थिक एवं सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण
भूमिका अदा कर रही है।
वेतनभोगी कर्मचारी सहकारी ऋण
समितियॉं:–
जनपद में स्थित विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत
कर्मचारियों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
संस्था के कर्मचारियों की सहकारी ऋण समितियॉं का गठन
कर उन्हें ऋण की सुविधा उचित साधारण ब्याज दर पर
उपलब्ध करायी जा रही है, जिसकी अदायगी उनके वेतन से 36
मासिक आसान किश्तों में करनी होती है। जनपद में कुल
100 वेतनभोगी कर्मचारी समितियॉं कार्यरत है। इनका
व्यवसाय वर्ष 2007–08 में 935.70 लाख रहा है।
इन समितियों द्वारा अपने सदस्यों को पूर्ति सदस्य
अधिकतम् दो लाख रू0 तक ऋण सुविधा अनुमन्य है। जिसका
अधिकतम ब्याज 12 प्रतिशत वर्तमान में प्रचलित है,
कर्मचारियों की ऋण सीमा उनके वेतन के आधार पर
निर्धारित की जाती हे जो कुल परिलब्धियों का 15 गुना
अथवा दो लाख में से जो कम हो बैंक द्वारा स्वीकृत की
जाती है।
यह ऋण सुविधा कर्मचारी के नियोक्ता द्वारा इस आशय के
प्रमाण पत्र पर होगी कि वह ऋण के देय किश्तों की कटौती
प्रतिमाह कर्मचारी के वेतन से करके उसका भुगतान संस्था/बैंक
को नियमित रूप से करता रहेगा।
सहकारी संघ/पूर्ति भण्डार:–
जनपद में 23 सहकारी संघ/पूर्ति भण्डार है जिनमें से 18
पूर्ति भण्डार सक्रिय है। कार्यरत पूर्ति भण्डारों
द्वारा किसानों/सदस्यों को खाद्यान्न सवाया के आधार पर
उपलब्ध करा रही है तथा कतिपय सहकारी संघों द्वारा नकद
आधार पर कृषि निवेश भी उपलब्ध कराये जा रहे है।
जिला सहकारी बैंक लि0,
मुजफ्फरनगर:–
जनपद में इसकी 40 शाखाएं कार्यरत है इसमें कुल सदस्यों
की संख्या– 307 है।
बैंक द्वारा जनपद की प्रारम्भिक कृषि ऋण सहकारी समिति
लि0, के माध्यम से फसली, अल्पकालीन ऋण उपलब्ध कराकर
कृषक सदस्यों को लाभान्वित कराया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त बैंक विविधीकरण योजना में कृषकों,
स्वैच्छिक संस्थाएं, स्वयं सहायता समूह, वेतनभोगी
समितियों के माध्यम से एवं सीधे राज्य/भारत सरकार
कर्मचारियों को आवासीय, वाहन, शिक्षा, उपभोग आदि ऋण
उचित ब्याज दर पर सुलभ कराया जा रहा है। जिनका विवरण
निम्नवत है:– |
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जिला सहकारी बैंक लि0, मुजफ्फरनगर (विविधीकृत ऋण
योजनाएं) |
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पैक्सका विकास खण्डवार विवरण:– |
जिला सहायक निबन्धक
सहकारी समितियॉ उ0प्र0,
मु्जफफरनगर | |
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